(1) मरीचि के पुत्र कश्यप प्रजापति थे। ब्रह्मदेव की दाहिनी हाथ की बोटे की नली से दक्ष नाम का पुरुष और बाएँ हाथ की बोटे की नली से धरनी नाम की स्त्री जन्मीं। उन दोनों से एक हज़ार-हज़ार महा ऋषि जन्मे। (2) ब्रह्मा के मानस पुत्रों में दूसरे स्थान पर रहने वाले अंगिरस्‍ु को उद्दध्य, बृहस्पति और संवर्त जैसे पुत्र हुए। बृहस्पति देवताओं के आचार्य बने। (3) मैत्रि (अत्रि) नामक मानस पुत्र से अनेक महा मुनि जन्मे। (4) पुलस्त्य नामक ब्रह्मा के मानस पुत्र से राक्षसों का जन्म हुआ। (5) पुलह नामक मानस पुत्र से किन्नर और किमपुरुष वर्ग उत्पन्न हुए। (6) क्रतू नामक मानस पुत्र से पक्षियों की जाति उत्पन्न हुई।

   
    

शान्तिपर्व (Mahabharat) - 12. शान्तिपर्व(महाभारत)


॥ श्रीः ॥
12.40. अध्यायः 040
Mahabharata - Shanti Parva - Chapter Topics
युधिष्ठिरेण भीमार्जुनाद्रीनां तत्तद्योग्ययौवराज्याद्यधिकारेषु नियोजनम्॥ 1॥


Mahabharata - Shanti Parva - Chapter Text

वैशम्पायन उवाच। 12-40-0x(5424)(66329)
प्रकृतीनां च तद्वाक्यं देशकालोपबृंहितम्।
श्रुत्वा युधिष्ठिरो राजाऽथोत्तरं प्रत्यभाषत॥ 12-40-1(66330)
धन्याः पाण्डुसुता नूनं येषां ब्राह्मणपुङ्गवाः।
तथ्यान्वाप्यथवाऽतथ्यान्गुणानाहुः समागताः॥ 12-40-2(66331)
अनुग्राह्या वयं नूनं भवतामिति मे मतिः।
यदेवं गुणसंपन्नानस्मान्ब्रूथ विमत्सराः॥ 12-40-3(66332)
धृतराष्ट्रो महाराजः पिता नो दैवतं परम्।
शासनेऽस्य प्रिये चैव स्थेयं मत्प्रियकाङ्क्षिभिः॥ 12-40-4(66333)
एतदर्थं हि जीवामि कृत्वा ज्ञातिवधं महत्।
अस्य शुश्रूषणं कार्यं मया नित्यमतन्द्रिणा॥ 12-40-5(66334)
यदि चाहमनुग्राह्यो भवतां सुहृदां तथा।
धृतरा यथापूर्वं वृत्तिं वर्तितुमर्हथ॥ 12-40-6(66335)
एष नाथो हि जगतो भवतां च मया सह।
अस्य प्रसादे पृथिवी पाण्डवाः सर्व एव च॥ 12-40-7(66336)
एतन्मनसि कर्तव्यं भवद्भिर्वचनं मम।
अनुज्ञाप्याथ तान्राजा यथेष्टं गम्यतामिति॥ 12-40-8(66337)
पौरजानपदान्सर्वान्विसृज्य कुरुनन्दनः।
यौवराज्येन कौन्तेयं भीमसेनमयोजयत्॥ 12-40-9(66338)
मन्त्रे च निश्चये चैव षाङ्गुण्यस्य च चिन्तने।
विदुरं बुद्धिसंपन्नं प्रीतिमान्स समादिशत्॥ 12-40-10(66339)
कृताकृतपरिज्ञाने तथाऽऽयव्ययचिन्तने।
संजयं योजयामास वृद्धं सर्वगुणैर्युतम्॥ 12-40-11(66340)
बलस्य परिमाणे च भक्तवेतनयोस्तथा।
नकुलं व्यादिशद्राजा कर्मणां चान्ववेक्षणे॥ 12-40-12(66341)
परचक्रोपरोधे च दृप्तानां चावमर्दने।
युधिष्ठिरो महाराज फल्गुनं व्यादिदेश ह॥ 12-40-13(66342)
द्विजानां देवकार्येषु कार्येष्वन्येषु चैव ह।
धौम्यं पुरोधसां श्रेष्ठं नित्यमेव समादिशत्॥ 12-40-14(66343)
सहदेवं समीपस्थं नित्यमेव समादिशत्।
तने गोप्यो हि नृपतिः सर्वावस्थो विशांपते॥ 12-40-15(66344)
यान्यानमन्यद्योग्यांश्च येषु येष्विह कर्मसु।
तांस्तांस्तेष्वेव युयुजे प्रीयमाणो महीपतिः॥ 12-40-16(66345)
विदुरं संजयं चैव युयुत्सुं च महामतिम्।
अब्रवीत्परवीरघ्नो धर्मात्मा धर्मवत्सलः॥ 12-40-17(66346)
उत्थायोत्थाय तत्कार्यमस्य राज्ञः पितुर्मम।
सर्वं भवद्भिः कर्तव्यमप्रमत्तैर्यथा मम॥ 12-40-18(66347)
पौरजानपदानां च यानि कार्याणि नित्यशः।
राजानं समनुज्ञाप्य तानि कार्याणि धर्मतः॥ ॥ 12-40-19(66348)

इति श्रीमन्महाभारते शान्तिपर्वणि राजधर्मपर्वणि चत्वारिंशोऽध्यायः॥ 40॥

Mahabharata - Shanti Parva - Chapter Footnotes

12-40-18 यत् अस्य कार्यं तच्च भवद्भिः कर्तव्यमित्यर्थः। अप्रमत्तैस्तथामयेति ट. द. पाठः॥ 12-40-19 तानि कार्याणि कर्तव्यानीत्यर्थः॥


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